अभिव्यक्ति कौशल

 अक्सर जब हम कोई वृतांत सुनते या पढ़ते हैं कि किसी नगर स्थान आदि पर कोई तत्ववेत्ता (कार्य-विषय का जानकार) या संन्यासी आए होते हैं तो आसपास के जिज्ञासु लोग उनसे मिलने को आतुर रहते हैं और चाहते हैं कि उन्हें अपने सवालों के जवाब मिलें। 

बीते दिनों पंडित लखमीचंद राज्य प्रदर्शन एवं दृश्य कला विश्वविद्यालय रोहतक में 3 दिवसीय पेंटिंग कार्यशाला का आयोजन हुआ। पेंटर यानि चित्रकार पृथ्वी सोनी जी ने कला छात्रों से अपने जीवन के अनुभव व कला-कौशल साझा किए। मध्यान्ह विश्राम आदि के बाद हम सभी पृथ्वी जी का इंतजार कर रहे थे कि इसी बीच प्रकाश दास खांडे जी जोकि अप्लाईड आर्ट के विभाग प्रमुख (H.O.D.) है, पृथ्वी जी के जीवन प्रसंगों के माध्यम से हम छात्रों को कला की बारिकियां समझा रहें थे। 

उन्होंने कहा कि हर कलाकार आरम्भ में अपने उन कामों से ही जुड़ा होता है जो उनके लिए केवल पैसे अर्जित करने का माध्यम हुआ करती है। पृथ्वी जी पहले पहल केवल फिल्मों से संबंधित पोस्टर, बड़े बड़े होर्डिंग ही बनाया करते थे। उस समय यह कला फिल्मों का एक मात्र प्रचार-प्रसार का आधार हुआ करती थी। इसी कारण लोग इन्हें केवल विज्ञापन की दृष्टि से ही देखा करते थेऔर थियेटर के माध्यम से फिल्मों से जुड़ते थे। इन बड़े बड़े होर्डिंग आदि को कोई भी कला की दृष्टि से नहीं देखा करता था। 

पृथ्वी सोनी जी एक मॉडल का चित्र बनाते हुए

आगे कहते हुए कि कोई भी आर्टिस्ट पहले कामकाजी आर्टिस्ट ही होता है वह उसके जरिए अपने जीवन से सम्बंधित आवश्यकताओं को पुरा कर लेता है।लेकिन कुछ ही आर्टिस्ट ऐसे होते हैं जो इस बात को समझते हुए चित्रण करते हैं कि केवल पैसों के लिए ही कार्य किया तो कला का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। इसलिए अनेक कलाकार अपने कामकाजी चित्रण से निकलकर आत्मतृप्ति के लिए चित्रण करते हैं। 


धीरे-धीरे पृथ्वी जी फिल्मी जगत के अनेक अभिनेता ओं के माध्यम से जुड़े और उनके लिए फिल्मों में कार्य किया । जब राजेश खन्ना जी का बंगला बेचा जा रहा था तो पृथ्वी जी द्वारा बनाई गई खन्ना जी की पेंटिंग को बेचा नहीं जाता । कुछ इस हद तक फिल्मी जगत में पृथ्वी सोनी जी लोकप्रिय हुए।  

हालांकि मैं पृथ्वी सोनी जी से नही मिल पाया था लेकिन जब मैं घर से चला तो मेरे मन में यह सवाल था जिसे मैंने प्रकाश देश पांडे जी से ही पूछा कि “वर्तमान में हम देख रहे हैं कि सभी लोग कलाकृतियां बनाते हैं और अपनी पुरी कुशलता के साथ कार्य करते हैं लेकिन उनके पास यह विचार नहीं होता की वह उसे क्यों बना रहे या किसी विचार को मध्य रखके भी सृजन कर रहे हैं तो वह विचार क्या ? और दुसरी तरफ कुछ लोग चित्रकला से सम्बन्धित विचार रखते हैं लेकिन वो बना नहीं पाते।" 

प्रकाश जी ने विनम्र भाव से कहा कि ”ऐसा नही कि बिना विचार कोई काम होता है। लेकिन हर बात में जरूरी है कि आपके पास अपनी भावनाओं या विचारों को अभिव्यक्त करने का कौशल (skill) है या नहीं? अब आपके पास केवल विचार ही है और आप अपने विचारो को बिना कौशल के कैसे अभिव्यक्त कर सकते हो? इसीलिए विचार के साथ अभिव्यक्ति कौशल भी जरूरी है।ताकि हम सभी अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त कर सकें इसीलिए कला है और अपनी भावनाओं को अच्छी तरह अभिव्यक्त करने वाला कलाकार।” 


इस पुरे लेख को केवल इस बात से समझा जा सकता है:- 

कला अर्थात बुद्धि, कलाका र अर्थात बुद्धि वाला, बुद्धि में आते हैं विचार, विचारों की होती है अभिव्यक्ति अभिव्यक्ति के माध्यम है - भाषण, गायन, चित्रण, नृत्य, अभिनय और लेखन आदि। 

कला की अनेकों परिभाषाओं में यह परिभाषा “अभिव्यक्ति की कुशल शक्ति ही तो कला है” -मैथिलिशरण गुप्त

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